Saturday, February 9, 2013

तेरी गली


ना वो खुशबु थी, ना रौशनी और ना ही वो आशिको का जमघट

तेरी गली से जब आज निकला तो लगा की शायद तूने ठिकाना बदल लिया.

Sunday, February 3, 2013

शब्द


शब्दों पर मुक़दमा था देश के खिलाफ बगावत का
अदालत में बैठे ग़ालिब के हाथ पर हथकड़ी थी

देश की अखंडता और एकता का मामला था
ग़ालिब ने सोचा "खुद को ख़तम करू या शायरी को"

क्यूंकि भावनाओ को ख़तम करना आसान नहीं.

Sunday, January 20, 2013

रोटी


मंदिर की सीड़ियों पर बैठे उस भिखारी से मैंने पूछा
तू हिन्दू है, मुस्लिम है, सिख है या ईसाई.

उसने मेरी तरफ देखा और टूटी हुई आवाज में बोला
साहब याद नहीं है, कई दिन से रोटी जो नहीं खाई.

दिशा


जब कुछ राहों के आखिर में
ना मंजिल होती है ना राहें

तब समझ लेना कि
यह अंत नहीं शुरुआत है.

जरुरत है तो बस दिशा बदलने की.

Monday, January 7, 2013

दर्द - ए - दिल्ली (2)


"मत दफनाना इस जमीन पर मुझे", चीखी थी वो.

यहाँ के इंसान लाश को भी नोच लेते हैं.

दर्द - ए - दिल्ली

डर नहीं था मुझे की मैं कुछ ना देख पाऊँगी.
एक सोच थी की बस कोई मुझे न देख पाए.

और मैं मुड़ गयी उस तरफ जिस रास्ते अँधेरा था.


Saturday, December 1, 2012

सब


सब उसी का बहीखाता है सब उसी का हिसाब
मैं उसी का सवाल हूँ और मैं उसी का जवाब

चाँद लम्हे भटकूँगा इन अनजान राहों में
ना ही मैं हकीकत हूँ और ना ही कोई खवाब