Monday, January 7, 2013

दर्द - ए - दिल्ली (2)


"मत दफनाना इस जमीन पर मुझे", चीखी थी वो.

यहाँ के इंसान लाश को भी नोच लेते हैं.

दर्द - ए - दिल्ली

डर नहीं था मुझे की मैं कुछ ना देख पाऊँगी.
एक सोच थी की बस कोई मुझे न देख पाए.

और मैं मुड़ गयी उस तरफ जिस रास्ते अँधेरा था.


Saturday, December 1, 2012

सब


सब उसी का बहीखाता है सब उसी का हिसाब
मैं उसी का सवाल हूँ और मैं उसी का जवाब

चाँद लम्हे भटकूँगा इन अनजान राहों में
ना ही मैं हकीकत हूँ और ना ही कोई खवाब

Saturday, November 10, 2012

अंजामें गुलिश्ता

जब हर साख पे उल्लू बैठा था 
हमने अंजामें गुलिश्ता देखा था 
आज तो हर साख पे कई कई उल्लू बैठे हैं......

Monday, November 5, 2012

काहे को फेसबुक बनायीं


काहे बनाया तूने फेसबुक का लॉग इन
चलता रहे ये चाहे रात हो या हो दिन
काहे बनाया तूने "स्टेटस" का खेला
जिसमे लगाया "लाइक, कमेंट्स" का मेला
गुपचुप पैसा कमाए, वाह रे तेरी चतुराई
काहे को फेसबुक बनायीं

फेसबुक बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
काहे को फेसबुक बनायीं
तूने काहे को फेसबुक बनायीं

तू भी तो बैठता होगा फेसबुक पे जाकर
नए नए updates और फोटो लगाकर
कोई डाटा तो होगा प्रोफाइल में तेरी
किसी ने किया होगा कभी उसको चोरी
हमारे डाटा से पैसा कमाए वाह रे तेरी बेशर्मायी
काहे को फेसबुक बनायीं

फेसबुक बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
काहे को फेसबुक बनायीं
तूने काहे को फेसबुक बनायीं

तूने जनता को एक श्वर में कहना सिखाया
साथ मिलना सिखाया, मिलकर लड़ना सिखाया
दुनिया में बड़े बड़े "revolutions" बनाये
"revolutions"  बनाके तूने सपने जगाये
सपने जगाके तूने जीवन भर की नींद उडाई
काहे को फेसबुक बनायीं

फेसबुक बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
काहे को फेसबुक बनायीं
तूने काहे को फेसबुक बनायीं



Tuesday, October 23, 2012

सजा


अपने गुनाह कुबूल मैं ना भी करूँ तो क्या
तेरी हर सजा तो मैं पहले ही काट चूका हु खुदा

दोस्ती

स्कूल में जब वो पहले दिन आया था
सहमा सा उससे मैंने एक कोने में बैठे पाया था
कपडे उसके बाकी बच्चे जितने साफ़ ना थे
और इसीलिए क्लास के बच्चे उसके पास ना थे
लंच ब्रेक में मैंने उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढाया
और हम दोनों ने मिलकर मेरा लंच खाया

...तब में आठ साल का था और वो सात का


ईद का दिन था आज और उसने था सोचा
अम्मी को दूंगा कुछ अच्चा सा तोहफा
कुल मिलकर हम पर था सिर्फ सोलह रुपैया
कुछ नहीं मिलेगा इतना में बोले दूकान वाले भैया
मैंने कहा एक साल हम खूब पैसे बचायेंगे
और अगली ईद पर तुम्हारी अम्मी के लिए दो तोहफे लायेंगे

...तब मैं बारह साल का था और वो ग्यारह का


अचानक कुछ दिन से जब वो स्कूल नहीं आया
पिताजी गुजर गये थे उसके, किसी ने मुझे बताया
घर की सारी जिम्मेदारी उसके कंधो पर आई थी
उसकी अम्मी तीन महीने से स्कूल की फीस भी नहीं भर पायी थी
मैंने वादा किया तेरी फीस मैं अपनी माँ से लेकर आऊँगा
मुझे क्या मालुम था की मैं अपने घर में ही मार खाऊँगा

.....तब मैं सोलह साल का था और वो पंद्रह का

ना जाने कहाँ से उसने मेरी नौकरी का पता जाना
उसने मुझे लिखा और कहा की मेरी दूकान पर जरुर आना
घर चलाने के लिए उसने चाय का एक छोटा खोखा लगाया था
अमेरिका जाने से पहले मुझे उसने एक बार दूकान पर बुलाया था
उसका घर और खोखा शहर के झोपडी वाले एरिया में पड़ता था
कुछ वक़्त कम था और कुछ वहाँ जाने का मनन ना करता था

.....तब मैं बीस साल का था और वो उन्नीस का

कुछ वक़्त पहले यहाँ अमेरिका में उसका ख़त आया था
शादी कर रहा था और उसने मुझे बुलाया था
और पूछा था की मैं शादी कब करने वाला हु
मजाक मैं बोला भी थी की क्या मैं कवारा ही मरने वाला हु
जो मेरा समाज उचित समझता मैंने वही किया
उससे कैसे कहता की मैंने उससे शादी का निमत्रण नहीं दिया

....तब मैं चौवीस साल का था और वो तेहीस का

जिंदगी की दौड़ में कितना कुछ पा गया मैं
एक एक करके ऐसे कितने वादे भूला गया मैं
वो ईद का तोहफा वो स्कूल की फीस,
आज बनकर रह गयी दिल मैं एक टीस.

काफी वक़्त गुजर गया जब उसका आखिरी ख़त आया था
उसने कोशिश तो की थी पर मैं दोस्ती का मतलब न समझ पाया था

....आज मैं अट्ठाईस का हु और वो .....शायद सत्ताईस का!