Meri Awaaz
Wednesday, July 31, 2013
Since 1947
सवाल ये नहीं हे की सियासी फैसले अकसर खून से ही क्यों लिखे जाते हैं ?
सवाल ये हे की जहां कुछ बूंदों से काम हो सकता है वहाँ समंदर क्यों बहाए जाते हैं ??
Monday, July 1, 2013
इंसान
"मंदिर में क्यों आते हो बेटा" पुजारी ने मुझसे पूछा
"सूना है यहाँ भगवान् मिलते हैं" मैं बोला
"भगवान् तो हर जगह हर इंसान में हैं, जाओ और खोजो" पुजारी ने कहा.
कुछ वक़्त बाहर खोजने के बाद में फिर मंदिर गया
"क्यों बेटा किसी इंसान में भगवान् दिखे?" पुजारी ने पूछा
"भगवान् को छोडो, मुझे तो इंसान में इंसान नहीं दिखे" मैंने कहा.
हम सब में
सिखाया गया है हमेशा से मुझे कुछ ऐसा |
हम सब में भगवान् है, सब में अल्लाह, सब में जीसस, सब में वाहेगुरु ||
पर देखा है मैंने जमाने में हमेशा से कुछ ऐसा |
हम सब में इर्ष्या है, सब में झूठ है, सब में कपट है, सब में लालच है ||
तो मुझे अब लगता है कुछ ऐसा |
ना किसी में भगवान् है, ना किसी में अल्लाह, ना किसी में जीसस, ना किसी में वाहेगुरु ||
या फिर |
भगवान् में इर्ष्या है, अल्लाह में झूठ, जीसस में कपट और वाहेगुरु में लालच ||
Sunday, June 30, 2013
इंसान या भगवान (2)
शिव लिंग पर एक लौटा दूध चढ़ाकर मंदिर से निकला था वो |
सीडियों पर बैठे एक भीखारी ने पानी माँगा तो उससे लात मार दी ||
इंसान या भगवान
मंदिर भी गया मैं, मस्जिद भी, गुरुदवारे भी और चर्च भी |
सबने धक्के मारकर मुझे बाहर निकाल दिया ||
मैंने बस इतना भर था पूछ लिया कि |
"भगवान् ने इंसान को बनाया है या इंसान ने भगवान को?" ||
Thursday, May 16, 2013
साल 1947 (3)
ये उनसे पूछो जिहोने देखा था वो मंजर |
की कैसे इंसान हैवान बन जाता है ||
साल 1947 (2)
चंद इंसानों की जीत ने अक्सर पूरी इंसानियत को हराया है |
कभी हिस्सों में बाटा है, कभी टुकडो में काटा है ||
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