Saturday, September 13, 2014

मंजिल या रास्ता

जब मंज़िलें हो दूर, बस रास्ते पर रख तू ध्यान

मंजिलें ना भी मिलें तो क्या
रास्ते बना सकते हैं तुझे खुदा

Sunday, August 24, 2014

एक दिन ये दुर्गा

मेरा तो मुझसे ही द्वन्द है
तुम्हारी साख बचाने को
मुझे नहीं जरुरत गोपाल की
अपनी लाज बचाने को

माँ की कोख से ही मेरा
संघर्ष शुरू हो जाता है
बेटे पर होता है जश्न
मेरे से मातम छा जाता है

पूरा जीवन मेरा तो
प्रताड़ना की एक कहानी है
बचपन मेरा घर में लड़ता है
घर के बाहर लड़ती जवानी है

इतिहास गवां है रणभूमि में
मैंने भी शस्त्र उठाये हैं
देश समाज की खातिर मैंने
दुश्मन मार गिराये हैं

पर शस्त्र  नहीं हैं मेरी शोभा
मुझको ना लाचार करो
कुछ कायरो से लड़ने को
ना इतनी फ़ौज तैयार करो

मेरी मर्यादा मेरी ममता
आखिर कब तक जीतेगी
एक दिन ये दुर्गा
अपनी तलवार तो खींचेगी

Tuesday, August 12, 2014

धर्म का रास्ता

स्वर्ग के लिए बना है या संसद के लिए बना है
ये धर्म का रास्ता आखिर ले जाता कहाँ है 

Sunday, April 20, 2014

मास्टर जी की कहानियां

तीस सालों में कभी किसी से इस बारे में बात ही नहीं की. ना कभी अपनी बीवी को बताया, ना कभी अपनी बेटी को और ना कभी दोस्तों को, पर पता नहीं क्यों आज फिर से एक बार मास्टर जी से कहानी सुनने का मन हुआ, या शायद आज तीस साल बाद मुझे जीवन में फिर से प्रेरणा की जरुरत थी.

बहुत प्रेरित करती थीं मास्टर जी की कहानियां.

गाँव के उस स्कूल में कूल मिलाकर तीन अध्यापक थे पर मास्टर जी की बात ही अलग थी, यूँ तो वो हिंदी और गणित पढ़ाते थे पर सारे बच्चे उन्हें पसंद करते थे उनकी कहानियों के लिए. मास्टर जी की हर कहानी बच्चो को जीवन में कुछ हासिल करने की लिए, कुछ बनने के लिए प्रेरित करती थीं. वैसे तो मास्टर जी के २० साल के करियर में कुछ ८-१० कहानियां ही थीं पर बच्चो को प्रेरित करने के लिए वो काफी थीं और आखिर हो भी क्यों ना, ये ८-१० कहानियां इसी स्कूल से निकले उन बच्चो की थीं जिन्होंने जीवन में कुछ हासिल किया था.

जब मैं गाँव पंहुचा तो सुबह के १० बजे थे, मुझे तो मालुम भी ना था की स्कूल आज भी चलता है या मास्टर जी आज भी स्कूल में पढ़ाते हैं पर ना जाने क्यों लगा की शायद चलता होगा और शायद मास्टर जी भी होंगे. मास्टर जी हफ्ते में सिर्फ दो दिन कहानी सुनाते थे मंगलवार को और शुक्रवार को, और आज शुक्रवार ही था

गाँव पहुंचकर में पहले सरिता मामी के घर गया. उन्हें भी मेरे हालात के बारे में कुछ ज्यादा नहीं पता था और ना ही मैंने कुछ ज्यादा बताया. थोड़ी देर बात करने के बाद मैंने मास्टर जी के बारे में पूछा, मामी का जवाब सुनकर मुझे एक अजीब सा अहसास हुआ,शायद थोड़ी सी ख़ुशी हुई और मैं चल दिया स्कूल की तरफ. पता नहीं मेरे चेहरे और मेरी आँखों ने मामी को सब कुछ बताया या उन्होंने खुद समझा पर वो भी मेरे साथ स्कूल की तरफ चल पढ़ी.

"हमारी आज की कहानी का मुख्य पात्र है - अमित कुमार", नाम सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए, वैसे मास्टर जी की हर कहानी रोंगटे खड़े करने वाली हो होती थी.

"तो बच्चो अमित कुमार ने १९८० में इसी स्कूल से आठवी पास की थी और फिर वो शहर स्कूल पढ़ने गया था".

मैंने मास्टर जी को नमस्ते की और फिर मैं जमीन पर बीछी चटाई पर बैठ गया मास्टर जी की कहानी सुनने, सारे बच्चो ने एक बार मेरी तरफ देखा और फिर कहानी में डूब गए.

मास्टर जी ने बच्चो को बताया की कैसे अमित गाँव से शहर पढ़ने गया, कैसे फिर उसने अच्छे कॉलेज इस इंजीनियरिंग की और फिर आगे की पढाई के लिए अमेरिका गया. मास्टर जी पूरे आनंद से अमित की कहानी सुना रहे थे.

और अपने ख्यालो में खोया हुआ ये सोच रहा था की काश में मास्टर जी के पास तीन साल पहले आता जब मेरी बीवी मुझे तलाक देकर मेरी एकलौती बेटी के साथ मुझे हमेशा छोड़कर चली गयी थी, या फिर तब आता जब ६ महीने पहले मुझे नौकरी से निकाल दिया गया था. पता नहीं क्यों ६ महीने इंतज़ार करने के बाद मैंने ये फैसला किया की अब अमेरिका छोड़ना ही मेरे लिए सही है. पिछले ३ सालो में मैं जिंदगी से हार सा गया था .

"तो बच्चो आज अमित अमेरिका में एक बहुत बड़ी कंपनी चलाता है और अपनी बीवी और बेटी के साथ वहीँ रहता है"

सफलता और असफलता देखने वाले के नजरिये पर निर्भर करती है. अपनी नजरिये से मैं शायद आज असफल था पर मास्टर जी के नजरिये से सफल. और मास्टर जी की कहानी ने आज फिर से सुनने वालो को प्रेरित किया था और उन प्रेरित होने वालो में से एक उस कहानी का मुख्य पात्र था.

कहानी खत्म करने के बाद मास्टर जी बच्चो के सवालो में व्यस्त हो गए. मैं चुपचाप उठकर चलने लगा तो मास्टर जी ने पूछा की बेटा कौन हो तुम?

"मास्टर जी ये ही तो है......" इससे पहले की सरिता मामी मेरा नाम बताती मैंने उन्हें रोक दिया. मेरे अंदर ना तो मास्टर जी की कहानी का अंत बदलने की शक्ति थी और न ही बच्चो की उम्मीद तोड़ने की.

मास्टर जी की कहानियां सच में आज भी बहुत प्रेरित करती हैं|








Saturday, April 12, 2014

राज

अगर राजनीति में 'राज' ना होता |
वो जो आज है, वो आज ना होता ||

Friday, September 20, 2013

मेरे घर

वो आये मेरे घर आज मुददतो के बाद
बुढापे में हुस्न के कदरदान कम हो जाते हैं|| 

Thursday, September 19, 2013

पीछे मुड़कर जब

पीछे मुड़कर जब देखता हु मैं, मंद मंद मुस्कुराता हु

दूर तक फैली हुई ज़िन्दगी, और उसमे बिताया वो एक एक पल
ऐसा लगता है मानो हुआ हो जैसे सब कुछ बस कल
ना कुछ मिटाना है मुझको न कुछ मैं बदलना चाहता हु
पीछे मुड़कर जब देखता हु मैं, मंद मंद मुस्कुराता हु

कितनी राहें तय की थी, और कितनी मंजिल मैं पहुच गया
कितने साथी साथ रहे और ना जाने कितना कुछ छूट गया
जो छुटा उसका गम नहीं, जो पाया उसका जश्न मनाना चाहता हु
पीछे मुड़कर जब देखता हु मैं, मंद मंद मुस्कुराता हु
 
कुछ सपने मिलकर देखे थे और कुछ सपने मैंने देखे अकेले थे
मैंने भी किसी के सपने तोड़े, और कुछ मेरे सपनो से भी खेले थे
पर मैं सपनो का सौदागर नहीं, बस ये बतलाना चाहता हु
पीछे मुड़कर जब देखता हु मैं, मंद मंद मुस्कुराता हु

कितनी बातें थी जो ना कहनी थी, पर फिर भी मैं कह गया
ऐसा भी था कुछ जो न सुन्ना था, पर मैं चुपचाप सह गया
दर्द हुआ था उन लम्हों मैं मुझको भी, ये जताना चाहता हु
पीछे मुड़कर जब देखता हु मैं, मंद मंद मुस्कुराता हु

कुछ लम्हे ऐसे भी आये, जब समझो बस सांस ही बाकी थी
उन कठिन लम्हों में ही तो हमने जीवन की कीमत आंकी थी
अनमोल है जीवन ये सीखा था, और बस ये ही सिखाना चाहता हु
पीछे मुड़कर जब देखता हु मैं, मंद मंद मुस्कुराता हु