Thursday, May 16, 2013

साल 1947


तमन्ना जागी थी मेरे दिल में फिर से गुलामी की |
जब देखा लाशो का ढेर, औरतो का बलात्कार, बच्चो के टुकड़े और जमीन का रंग ||

Tuesday, May 14, 2013

जिन्दगी


जिन्दगी मानो एक तरफ पहाड़ और एक तरफ खाई थी |
हम कई दफा पहाड़ पर भी चढ़े और कई दफा खाई में भी उतरे ||

शुक्रगुजार हूँ मैं तेरा किस्मत, तूने ना की बेवफाई थी |
जिंदगी फिर से एक तरफ पहाड़ और एक तरफ खाई थी ||

Friday, May 3, 2013

गलत


शायद गलत धरम, गलत देश या गलत वक़्त में जन्मा हूँ मैं |

इंसान तो दिखते हैं पर इंसानियत नज़र नहीं आती ||

Thursday, April 18, 2013

दौड़


जिंदगी की दौड़ मे मैं अकेले ही दौड़ता हू
रोज नए मापदंड बनाता हू और खुद को पीछे छोड़ता हू

Friday, April 5, 2013

मंत्री जी की देन


Note: One of my first poem, wrote this in year 2002 when I joined Motilal Nehru NIT, Allahabad. This is a work of fiction.  

मैंने भी इन्टर की परीक्षा की पास थी
और दिल में इंजिनियर बनने की आस थी
मुझे तो बस सफलता की प्यास थी
खैर ये सब तो बकवास थी

अब बात वो जो की ख़ास थी

कोचिंग का मैंने लिया सहारा
पढाई पर दिया ध्यान सारा
दो साल तक कहीं नंबर ना आया
मुझे मेरे रिजल्ट ने बना दिया नकारा
और मैं फिरा मारा मारा

फिर अचानक ....

मुझे एक मंत्री जी की याद आई
जिन्हें थी मैंने एक सभा में माला पहनाई
उन्हें जाकर मैंने अपनी कहानी सुनाई
वो बोले दुखी मत हो भाई

और पूछा

और पूछा कौन सा कॉलेज चाहिए
मैंने कहा अब तो कुछ भी दिलवाइए
वो बोले मोतीलाल चलेगा
मैं चौंका, क्या वह भी मिलेगा

उन्होंने कहा पैसे का करो इंतज़ाम
हो जायेगा तुम्हारा काम

और फिर

मैं यहाँ आया क्यूंकि
मंत्री जी को दिया पैसा
तभी तो हुआ कुछ ऐसा
वरना मुझमे कहाँ है इतना ब्रेन

मोतीलाल है "मंत्री जी की देन".

Monday, February 25, 2013

ऐसी कोई लहर


तेरे पैरो के निसान रेत से मिट तो जाते....
पर जो वहाँ तक पहुच सके
ऐसी कोई लहर नहीं आई तेरे जाने के बाद.

पैमाना

"ज़रा यहीं ठहरो तुम, मैं बस कुछ मिनटों में आता हूँ" कहकर गया था वो.
मिनट दिनों में बदलते गए, दिन महीनो में और महीने सालो में.

सोचता हूँ की उसका समय का पैमाना गलत था या मेरा विश्वास का.